Thursday, December 31, 2009

●๋•खत ●๋•

खुशबू
बाकि है तेरी,
एक रात जाग रही है,
अब तक पुराने ख़त में
आज नींद आई है
उसी रात को सुलाने ख़त में

दोस्त, आज भी
वादा याद करके अपना
मैं ढूंढता हूँ
जीने के बहाने ख़त में।

वो चाँद ,वो छत ,वो शाम
वो अश्क और वो आँहे
सुब कुछ नज़र आता है
दीवाने ख़त में

आके पहलू में मेरे
तन्हाइयो को महकाती है
आज भी खुशबु बाकि है
तेरी ,सुहाने ख़त में।

'तू खुद सुना रहा है
अपने ख़त का हर लफ्ज़ पढ़कर
ये पुरसुकू ख्वाब भी रहता है
सिरहाने ख़त में।

मैं इसको जला दू या
बहा दूँ कैसे 'आज़ाद'
नई उम्मीद रहती है मेरी
तेरे पुराने
ख़त में
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सुधीर आजाद

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